पर्वत की चोटी पर
वैसाख कि झुलसती धूप में
खिल उठता पलाश
पाषाण का सीना चीर कर
उग आता है पिपल
उखाड़कर फेंक देने पर भी
जड़े पकड़ लेती है बेलें
एक इंसान ही हैं
जो दुःखों के राई का
पहाड़ बनाकर
सिर पर उठाए धुमता है