कोरा कागज सा ही था जीवन
बिल्कुल श्वेत ,बेदाग सा जीवन
किसी कोने में दाग का निशाँ नही
चमकता था मुस्कुराता जीवन
क्यूँ लिख दिए इसपर लालच
क्यूँ छाप दिए इसके मूल्य भी
कीमत नही था जब कोई हमारा
ढाहके लगा कर हँसता था जीवन
कोई चोरी बेईमानी लिख दिया
कोई निज हैवानी लिख दिया
गलती से गर कही सच लिखा
लोगो ने मेरी नादानी लिख दिया
कोई मरोड़ कर सड़क पर फेका
किसी ने दिल से उठाकर के देखा
किसी कोने में लिखा प्रेम था जीवन
किसी को लगा अटपटा सा जीवन
कोरा ही था सब को प्यारा बहुत
सबकी नजरो का दुलारा बहुत
सहलाते थे सब लिखने से पहले
अब तो हूँ ठोकर का मारा बहुत
क्यूँ लोगो ने लिख दिया मुझपर
तरस न आया तनिक भी मुझपर
तवाह कर दिया जिसने जब चाहा
पढ़ा ही दिया कुछ लिख मुझपर।।
-छबिराम यादव छबि
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