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इस बार प्रण तो निश्चित करना होगा

chandresh pragya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर बार प्रतिज्ञा करते हैं,
        
                                                    
                            
देश के लिए कुछ अच्छा करेंगे,
झंडा फहराकर गर्व जताते हैं,
फिर अपने वादे भूल जाते हैं।
हर बार सोचते हैं मन में,
भ्रष्टाचार को जड़ से रोकेंगे,
पर काम अटकता है जब अपना,
खुद ही रिश्वत की नोट पकड़ाते हैं।
हर बार कहते हैं—इस बार,
कार्यालय जाकर तिरंगा फहराएँगे,
पर अगले दिन सुबह की नींद में,
अपने संकल्प को भूल जाएँगे।
अपने व्यवहार से किसी का,
दिल कभी न दुखाएँ हम,
खुद भी आगे बढ़ते जाएँ,
दूसरों की राह न रोकें हम।
न किसी के काम में टाँग अड़ाएँ,
न किसी की तरक्की से जलें,
हर इंसान को आगे बढ़ने दें,
और मिलकर देश के लिए चलें।
देश के प्रति भाव दिखाने का,
एक दिन नहीं, हर दिन अवसर है,
सच्ची श्रद्धा केवल शब्द नहीं,
कर्मों में दिखाना ही बेहतर है।
चलो, इस बार झंडा भले न फहराएँ,
पर एक प्रण तो निश्चित करें—
ईमानदारी, सम्मान और सद्भाव से,
अपने भारत को बेहतर करें।
तिरंगा केवल हाथों में नहीं,
हमारे व्यवहार और कर्मों में भी लहराना चाहिए।
2 महीने पहले
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