यन्त्र तंत्र मंत्र से दूर कहीं हाथ की आड़ी-तिरछी रेखाएं बन जाती है।
जितनी ये रेखाएं गाढ़ी होती हैं मनुज की कर्मठता को ये दर्शाती हैं।।
कर्म पथ पर चलता जीवन रुक रुक कर हाथ मसलता जाता है।
किसी के हिस्से ज्यादा आता तो कोई कर्म फल को तरस जाता है।।
वैसे यह यंत्र विज्ञान अति महीन शाय़द ठीक समझ कोई नहीं पाता है।
जीवन मार्ग अति कठिन कर्म ही भाग्य अक्सर यहां फिर बन जाता है।।
जिसके जैसे कर्म रेखाएं भी उसी सांचे में अक्सर फिर ढल जाती हैं।
यह जन्म नहीं तो अगले जन्म अपना फल रेखाएं अक्सर दे जाती हैं।।
इन रेखाओं का खेल निराला कोई राजा कोई रंक यहां बन जाता है।
इन रेखाओं के भ्रमजाल में चक्की के दो पाटों में मनुज पिसता जाता है।।
कहे शेखर कविराय मत ढूंढो इन रेखाओं में तुम भविष्य अपना।
कर्म पथ है सच्चा पथ यही दिखाता है इस जग का सुन्दर सपना।।
मुंगेरी लाल बनकर कोई सपनों को पूरा कर न कभी पाता है।
कर्मों के रथ पर होकर सवार कायर भी बहादुर फिर बन जाता है।।
इस यंत्र विज्ञान का गहरा सत्य हस्त रेखाओं में छुपकर रहता।
जो पढ़ना जानता इन रेखाओं को हर कठिनाई से वह बचकर रहता।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय