"गली में रावण घूमें "
गली गली में अब रावण घूमें,
गली गली में रावण के नाती।
कलियुग में अब नहीं दिखता,
कहीं राम का फिर से साथी।।
कहीं राम का फिर से साथी,
केसा समय आज यह आया है।
जहां देखो वहीं अंधेरा पाया है।
सूरज अब तक उग नहीं पाया है।।
दुष्कर्मियों ने मिलकर अब जैसे,
अलग-अलग खेल फिर रचाया है।
छद्म वेश में फिर से रावण आया है
पुनः सीता हरण का स्वांग रचाया है।।
रावण की सेना हर गली में घूम रही है
बोटी बोटी जन जन की चूस रही है।
नहीं कलियुग का राम कोई बन पाया है
रावण सीता हरण करने फिर से आया है।।
राजनीति बदरंग हुई समझ न आया है
जीवन का हर सपना झूठा अब पाया है।
बहन बेटियों के ऊपर मंडराता साया है
फिर से सीता हरण करने रावण आया है।।
कितने हाथ कितने सिर रावण के बन जाते
कितनी बहन बेटियों के सपने चूर हो जाते।
कैसे कहें कहां सुरक्षित आज कोई सीता है
जहां हर क़दम न कहीं ख़तरे से रीता है।।
एक आंख के आंसू सूखे नहीं
दूजी आंख में आंसू आ जाते हैं।
पलक झपकते ही सारे सपने आज
क्षणभंगुर से अब तो हो जाते हैं।।
औरों की बेटी पर निगाह डालने से पहले,
अपनी बेटी की ओर भी नजर दौड़ा लेना।
पल दो पल का ही तो यह जीवन है
इस जीवन को थोड़ा सुन्दर बना लेना।।
राम बनो फिर से उस रावण को मारो
जो तुम्हारे अंदर छुपकर अब बैठा है।
छल कपट और दंभ दिखाकर फिर से
किसी सीता के हरण को फिर से कहता है।।
नहीं हनुमान बन कोई राम का साथ निभाता है।
लगता है कालनेमी रूप बदलकर आ जाता है।
रावण और अहिरावण मिल दुष्चक्र रच जाते हैं
कहीं सीता तो कहीं राम को उठा ले अब जाते हैं।।
किस पर अब कैसा विश्वास करें,
हर क़दम पर धोखा अब मिलता है।
जहां पर हम राम खोजते तो वहां
हर जगह रावण का चेहरा दिखता है।।
मतलब परस्ती अब हावी होकर
कैसे कैसे खेल अब दिखाती है।
प्रेम पाश में बंधकर सीता अब तो
धोखे से अक्सर छली जाती है।।
-चन्द्र शेखर मार्कंडेय