कौन है अपना कौन पराया,
लोभ से हुआ जग अन्धियारा।
समय बदलता सबने देखा,
अपने ही अब बदले हैं।
किसे समझते अपना-अपना,
कोई नहीं है जग में अपना।
स्वार्थ भरी ये दुनिया अपनी,
सब स्वार्थी बनकर बैठे है।
किरकिट जैसे रंग बदलती,
दुनिया को मैने देखी है।
अपनो को भी रंग बदलते,
एक नज़र से परखा है।
माता - पिता हैं जग में अपने,
इनके बिना कोई और नही है।
बाजारों में सब कुछ मिलता है,
माता - पिता नहीं मिलते हैं।
सच्चे मन से सेवा करलो,
माता - पिता ही अपने हैं।
वक्त का पहिया विपरीत चलता,
किस्मत भी नहीं अपनी है।
कवि- चंदन सिंह सारंगदेवोत
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