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इंटरनेट का काल

Chandan singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लिख रहा हूं कविता,
        
                                                    
                            
पढ़ेगा कौन?
जमाना है इंटरनेट का,
आगे बढ़ेगा कौन?

समय नहीं पास इनके,
जो कविता पढ़ सके।
व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम से,
ध्यान कैसे हटा सके।

इंटरनेट के चक्कर में,
घूमती है दुनिया मोबाइल में।
सुबह शाम का पता नहीं,
घूसी रहती है रजाई में।

पिता बोले बेटे से,
परीक्षा तेरी सर पर है।
बेटा बोला हां पापा,
दोस्त मेरी घर पर हैं।

इंटरनेट के काल में,
बोलना सुनना कम हुआ।
हाय! हेल्लो! के चक्कर में,
राम- राम बंद हुआ।

कवि - चंदन सिंह सारंगदेवोत
मो. न.- 9653770070
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करे।
4 वर्ष पहले
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