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एक बारिश, अनेक नज़रिए

Chanchal Agg

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ही बारिश की बूंदें थीं, पर मंज़र कितने आम हुए,
        
                                                    
                            
कोई खुशियों से झूम उठा, तो कोई बेहद परेशान हुए।
एक तरफ देखी वो लड़की, जो अपनी महँगी शान बचा रही थी,
भीग न जाए लक्ज़री बैग उसका, वो खुद को झुकाए जा रही थी।
तभी पास में एक मासूम सी बच्ची, ठंड से ठिठुरती दिखाई दी,
नहीं थी फिक्र किसी बैग की उसे, वो बस एक छत की आस में रोती दिखाई दी।
एक कोने में एक नन्ही मुस्कान, पानी की छपाक से खेल रही थी,
अमीरी-गरीबी के बंधनों से दूर, वो हर बूंद को खुद में समेल रही थी।
वहीं पास खड़ा एक नौजवान, अपने गंदे जूतों पर झल्लाया था,
मौसम की इस खूबसूरत रुत में भी, उसने बस गुस्सा ही पाया था।
एक चाय वाले के चेहरे पर, बरकत की खिली मुस्कान देखी,
बारिश में बढ़ती बिक्री से, उसने अपनी बढ़ती शान देखी।
पर बंद शीशों की गाड़ी में बैठा, एक शख्स जाम से हारा था,
गुस्से में वो हॉर्न बजाता, किस्मत को अपनी धिक्कार रहा था।
सोच रहा हूँ कितनी अजब है दुनिया, और कितनी अजब इसकी रीत है,
यहाँ हर कोई अपने ही हालातों और अपनी ही मुश्किलों का मीत है।
कोई अपनी कीमती चीज़ बचाने को, हर लम्हा घबराता है,
तो किसी को सिर छुपाने को, बस एक साया ही भाता है।
उस दिन मेरी आँखों के आगे से, भ्रम का वो पर्दा हट गया,
ज़िन्दगी का ये कड़वा सच, मेरे ज़हन में खुलकर छप गया।
दुख, दर्द और गम तो यहाँ, हर एक इंसान के हिस्से हैं,
बस देखने का नज़रिया अलग है, अलग सबके किस्से हैं।
-चंचल
2 महीने पहले
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