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अनगिनत ख़्वाहिशों के पीछे

Brajesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनगिनत ख़्वाहिशों के पीछे
        
                                                    
                            
जग भाग रहा है यहाँ वहाँ
इक पल को भी इसको चैन नहीं
बस आँखें मिंचे पड़ा यहाँ
ना ख़बर कि जाना किधर इसे
ना पता ही कि कहाँ रुकना है
बस आँखें मूंदे दौड़ रहा
बेख़बर कि किस हद तक झुकना है
कुछ पा कर भी कहीं ख़ुशी नहीं
होठों पे थोड़ी सी हँसी नहीं
माथे पे शिकन मन में चिंता
साँसें हैं जैसे फँसी कहीं
इस दौर की यही सच्चाई
सब त्याग रहा इंसान यहाँ
अनगिनत ख़्वाहिशों के पीछे...।
3 महीने पहले
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