शाम की उदासी
और ये उतरता हुआ
वक़्त का नूर
कुछ तो बात है
कुछ तो हुआ है ज़रूर
शाम अब ढल रही है
मोम की तरह पिघल रही है
अब ये रात का रूप
लेकर बिखरेगी चाँदनी
शाम अब बूढ़ी होगी
और रात जवान होगी
अब शाम का नामोनिशाँ ना होगा
और रात का कारवाँ होगा
जो सुबह तक साथ देगा
और सुबह के होने पर
देह त्याग देगा...
-जितेंद्र कुमार
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