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शाम की उदासी

                
                                                         
                            शाम की उदासी
                                                                 
                            
और ये उतरता हुआ
वक़्त का नूर

कुछ तो बात है
कुछ तो हुआ है ज़रूर
शाम अब ढल रही है
मोम की तरह पिघल रही है
अब ये रात का रूप
लेकर बिखरेगी चाँदनी

शाम अब बूढ़ी होगी
और रात जवान होगी
अब शाम का नामोनिशाँ ना होगा
और रात का कारवाँ होगा
जो सुबह तक साथ देगा

और सुबह के होने पर
देह त्याग देगा...

-जितेंद्र कुमार


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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