"इस परमाणु में विभाजित युग में,
समय एक खतरनाक चमक के साथ गूंजता है।
लड़कियाँ
शूर्पणखा की परछाइयाँ और
सलोमे की प्रतिबिंबित भूख धारण करती हैं।
पुराण सोते नहीं;
वे रक्तधमनियों में भी
और स्क्रीन की रोशनी में भी बस जाते हैं।
नियंत्रित कामना के यज्ञपीठ पर,
एक कटा हुआ पुरुष-शीर्ष
आज भी साँस लेता है।
आँखें खुली हुई,
इतिहास बिना पलक झपकाए।
उसके चारों ओर
दुःख नहीं,
विनाश का एक नृत्य-निर्देशन फूट पड़ता है।
नैतिकता की दरारों में
पाँव ताल देते हैं;
हँसी, चमकते ज़हर की तरह,
फैलती चली जाती है।
कुछ पुरुष,
रीढ़विहीन दर्शक,
अपनी कामनाओं को
गन्ने के रस की तरह बूंद-बूंद टपकाते हैं;
मीठा-सा,
उत्सुक,
बिना प्रश्न किए।
अपनी ही टूटन के लिए
वे होसन्ना गाते हैं;
समर्पण को
अतिमानवता समझ बैठते हैं।
उसी समय,
अंतहीन सृजन-ज्वर,
अंतहीन सामग्री की बाढ़,
मनुष्यों को
समय की मुर्गियों में बदल देती है।
अदृश्य चाकुओं की ओर
उनकी चोंच मारती दौड़;
हर पोस्ट
ताली के लिए नोचा गया
सिर्फ एक पंख है।
एल्गोरिदम मुस्कुराता है;
विद्युत-दाँतों वाला
एक मौन देवता।
पहचान
दृश्य-चमत्कार में घुल जाती है;
दृश्य-चमत्कार
सत्य से भी तेज़ बढ़ता है।
कौन नाच रहा है?
कौन नचाया जा रहा है?
इस परमाणु युग में,
आत्मा भी झिलमिलाती है;
आधा पदार्थ,
आधा मिथक,
और पूरी तरह दहनशील।