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जो दौड़ पड़ते थे छोटी  उफ़ और आहों मे

BIJAY TIWARI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो दौड़ पड़ते थे छोटी  उफ़ और आहों मे
        
                                                    
                            
सुकून मिलता उन्हें है आज मेरे कराहों मे
लगाते थे महीनों रुमालों पे नाम लिखने मे
डिलीट कर देते मेसज आज नाम दिखने से ॥

हर वक्त बसा करते थे हम जिनके चाहों मे
ठसक से ठुमके लगाते थे  जो मेरे बाँहों मे  
पराये नाम का आज  वो   शृंगार करते हैं
मेरे रकीब से गले लगा वो प्यार करते हैं ॥

बहाने बना, आ जाते थे,  जो मेरी राहों मे
चश्मेबद्दूर बन चुके हम उनकी निगाहों मे  
घंटो सजते,सँवरते थे जो छुपके मिलने को
वर्षों बाद, नही तैयार,पल भर भी दिखने  को॥

चिढ़ाते आज मुझे बैठ जो  अपने चौबारे से
शर्म से गुजरे नहीं कभी   वो मेरे द्वारे से
हकीकत है यहीं हम आज भी उनपर मरते हैं
जो आज मेरे      जिंदा  रहने  से  डरते  हैं ॥

दबे पांव  गुजरती है वो मेरी गलियों से
रोकती खुद को कविताओं की टिप्पणीयों से
अनभिज्ञता के आंचल से मुंह को छिपाये
  मेरे बारे में नहीं बोलती,अब पुरानी अलीयों से।।
-बिजय बहादुर तिवारी
 
एक महीने पहले
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