राजनीति की बिसात
में मोहरे बड़े बिझे है ।
यहां हर प्यादा चालाक समझता है
उनके ख्वाब भी बड़े ऊंचे है ।।
रात हो गई गमगीन
बोली लगा रहा था गिनगिन ।
क्यो छोड़ी थी इंसानियत
कहां है तेरे पीछे की चाहत॥
बंदुक किसी और का कंधे किसी और का
चलाने वाला कहीं और का ।
आज प्यादा बड़ा खुश हुआ
छोड़ चले अकेले तब
सैदाई को बड़ा दुःख हुआ ।।
इसीलिये तो कहता हुं
राजनीति के बिसात के मोहरे मत बन ।
लगा दे अपना सर्वर्सव
अपने मंजिल मे
सफलता की झंकार बाजे छन छन ।।
- भुनेश्वर अनंत