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आज नई ज्योति भरो

bhoopesh pratap

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                            आज नई ज्योति भरो
        
                                                    
                            
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सूरज से ज्योति ले चन्दा से कान्ति ले
नदियों से अविरल गति पंछी से गीत से
भौंरों की गुनगुन से गाने की रीति सीख
हर उदास चेहरे पर खुशियों की रेख खींच
हृदय के ताप हर प्रेम के भाव भर
दुनिया के जन-जन में धरती के कण -कण में
आज नई ज्योति भरो ।

गाँव शहर गलियों में ,मुरझाई कलियों में
जलते दीप के तले अन्न फूल फलियों से
नीरसता खींच-खींच श्रम जल से सींच-सींच
नव प्राण भरते रहो अथक बन चलते रहो
कल्पवृक्ष छाँव भी आलस न भरने पाए
वसुधा के तृण -तृण में प्राणी के रग -रग में
आज नई ज्योति भरो ।

युद्ध न होने पाए शान्ति न खोने पाए
पत्थर की चोट सह क्रान्ति न रुकने पाए
कण्ठ की वीणा साध गीत गुनगुनाते चलो
सधे हुए कदमों से सृजन गीत गाते चलो
दुनिया के घर -घर में जन- जन के उर-उर में
आज नई ज्योति भरो ।
-भूपेश प्रताप सिंह
2 महीने पहले
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