ईंट
वह जानता था
कि यह दीवार
सही जगह नहीं उठ रही।
नक्शे में
खिड़की कहीं और थी,
दरवाज़ा कहीं और।
मगर उसके हाथ में
सिर्फ़ ईंटें थीं।
नक्शा
किसी और के हाथ में था।
वह चाहता था
कह दे-
यह दीवार गिर जाएगी।
पर उसने देखा,
मसाला गाढ़ा था,
आवाज़ें ऊँची थीं
और सवाल पूछने वालों के लिए
दरवाज़े पहले ही बंद थे।
सो उसने
एक ईंट रख दी।
फिर दूसरी।
हर ईंट के साथ
उसके भीतर का
एक छोटा-सा सच
दीवार में चुनता चला गया।
चेहरे पर
काम पूरा करने की तसल्ली थी,
अंदर
किसी पुराने आईने में
दरार पड़ रही थी।
लोगों ने कहा-
वह बहुत समझदार है।
उसे भी लगा,
शायद समझदारी यही है!
गलत को पहचानना,
चुप रहना
और सही समय का इंतज़ार करना।
बस उस आईने ने
धीरे से पूछा-
“सही समय आएगा भी,
या हर बार
एक नई ईंट मिल जाएगी?”
वह चुप रहा ।
दीवार बढ़ती रही।
और उसके भीतर कुछ
धीरे-धीरे छोटा होता रहा।