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माला और मन

भास्करानंद झा भास्कर

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माला
        
                                                    
                            
जब यह बन जाती है मन
कंठहार प्रेम
चढ जाता है ऊँचा हिमालय
भावनाओं की
चोटी को चूम चूम कर
मन हो जाता है
प्रेमातुर
कटिबंध में झूलते हुए
नीचे बहते गहरे प्रेम सागर में गिरने को व्यग्र...

मन
जब यह बन जाता है माला
लिपट जाता है
किसी प्रेयसी के गले से
सप्रेम आजीवन
सुसंचित भावनाओं से अभिषिक्त
अनुरंजित अनुराग
मरुवन मध्य
नव पल्लव सदृश्य हृदय में
तब खिल जाता है जीवन का सुगन्धित पराग...

-भास्करानंद झा भास्कर
एक महीने पहले
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