बढ़ते वक्त के साथ ' कुछ तो पीछे छूट जाता है।
उस छूटे हुए पृष्ठ को , मै ' फिर लिखना चाहती हूं।
अनकहे ' आखो से ' बहुत कुछ बयां हो जाता है।
मैं सब पीड़ीत व्यक्ति की , मरहम बनना चाहती हूं।
कश्ती ही डूब रही ' जिन लोगों की , बीच मझधार मे ,
मै ' मेरी कलम संग , पतवार बनना चाहती हूँ।
रुखसत नही करते लोग ' अपनो को छोड़कर के ,
मैं अपनेपन के भाव को ' जगाना चाहती हूं।
जो सोए हुए है ' अभी भी 'संकरी व संकीर्ण दुनिया में '
गहन अंधकार मिटाकर ' प्रेम -ज्योति जलाना चाहती हूं।