है शख़्स क़ब्र में या फिर किसी मसान का है
ज़मीं पे कौन भला कब किसी मकान का है
गली गली में ये चर्चा तेरे बयान का है
बयान तेरा ये लेकिन तेरी रुझान का है
बता रहे हैं पुराने महल के ये खंडर
ज़मीं पर है जो मलबा उसी मकान का है
है क्या नसीब में कोई नहीं बता सकता
नहीं ये वक़्त किसी का ये इम्तिहान का है
तमाम लोग उसे देख कर हैं हैरत में
ज़मीं का है ये परिंदा कि आसमान का है
पनाह में था ख़ुदा की था हश्र में जब तक
जहां में भी यही काम पासवान का है
नहीं है मुल्क में अम्न-ओ-अमान की चाहत
यक़ीन कब उसे त्यागी किसी ज़ुबान का है