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है शख़्स क़ब्र में या फिर किसी मसान का है

Bhadrapal Tyagi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            है शख़्स क़ब्र में या फिर किसी मसान का है
        
                                                    
                            
ज़मीं पे कौन भला कब किसी मकान का है

गली गली में ये चर्चा तेरे बयान का है
बयान तेरा ये लेकिन तेरी रुझान का है

बता रहे हैं पुराने महल के ये खंडर
ज़मीं पर है जो मलबा उसी मकान का है

है क्या नसीब में कोई नहीं बता सकता
नहीं ये वक़्त किसी का ये इम्तिहान का है

तमाम लोग उसे देख कर हैं हैरत में
ज़मीं का है ये परिंदा कि आसमान का है

पनाह में था ख़ुदा की था हश्र में जब तक
जहां में भी यही काम पासवान का है

नहीं है मुल्क में अम्न-ओ-अमान की चाहत
यक़ीन कब उसे त्यागी किसी ज़ुबान का है
8 महीने पहले
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Nathuram Kaswan

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