ये बरसात का मौसम तो गुज़र जाएगा
जो आँखे रोज़ बरसती है
उनकी फ़िक्र करो!
ये घटाएँ तो आती जाती रहेगी यूँ ही
जो बाहें रोज़ तरसती हैं
उनकी फ़िक्र करो!
ये रुत यूँ ही रंग बदलती रहेगी सदा
जो नज़रें कभी नहीं बदलती हैं
उनकी फ़िक्र करो!
पतझड़ के बाद फिर बाहर आ जाएगी
जो पत्तियाँ शाख़ से टूट जाती हैं
उनकी फ़िक्र करो!
- बेफ़िक्र ते बेपरवाह