जिसको अपना समझा,
वही शख्स, ज़ख्म गहरे दे गया।
मेरी वफाओं के बदले में,
सारे सुनहरे, मेरे सपने ले गया।
उसे पसंद थी सूरज की रोशनी,
मैं पूरी ज़िंदगी बस चिरागों में रह गया।
खुद की परवाह किए बगैर, मैं वो जहाज बना,
जो उसको पार लगाकर, खुद किनारों में रह गया।
वो साहिबा की तरह लोगो के दिल में बस गई,
मै मिर्ज़ा की तरह बस किताबों में रह गया।
मुस्कुरा कर उसने फेर ली निगाहें 'बसंत',
वो हकीकत बन गई, मैं ख्यालों में रह गया।
- बसंत पंवार 'प्रजय'