एक नया तीर आ के दिल पे लगा है मेरे,
अभी तो पुराने ज़ख़्म भरे नहीं थे।
जिस तरह से वो मशहूर कर रहा है बुराइयाँ मेरी,
यक़ीन मानो... हम कभी इतने बुरे नहीं थे!
मुझसे दुश्मनी निभाने में उसने पूरा बाग़ उजाड़ दिया,
उन मासूम फूलों का क्या दोष जो अभी पूरे खिले नहीं थे।
हम तो उनकी बेरुख़ी का सबब बहुत पहले समझ गए थे,
जब वो हमारे शहर में आए तो थे, मगर हमसे मिले नहीं थे।
हम तो ख़ामोश रहे ताकी रस्म-ए-वफ़ा बची रहे,
वरना तमाशा बनाने के हुनर से हम भी कच्चे नहीं थे।
-बसंत पंवार प्रजय