उसकी नन्हीं पलकें झपक रही थीं बार-बार,
कभी इधर निहारती, तो कभी उधर।
चाक घूम रही थी अपनी धुरी पर,
और उसकी कल्पनाएँ अपनी धुरी पर।
"दादा, आज तुम पेठा लाओगे?"
दादा का चेहरा कुछ अजीब-सा संकुचा गया।
फिर दादा ने चेहरे पर हल्की-सी भंगिमा बनाई
और स्वाभाविक-सी सहमति जता दी।
क्योंकि दादा को भी पता न था
कि आज उसके मिट्टी के दिए बिकेंगे या नहीं,
पोती की इप्सा पूरी होगी या नहीं।
दादा पूरे दिन धूप में तपता रहा,
मिठाई की दुकान की ओर तकता रहा।
गोधूलि में जब दादा ने टटोला खीसा,
तो उसमें था कुछ ही पैसा,
जिससे वह या तो रोटी ही ले सकता था,
या पेठा।
दादा की उन बूढ़ी आँखों में
अब भी उदासी थी।
अगर बिक गए कुछ दिए,
तो आज मनाएँगे दीवाली।
खील-बताशे, पटाखे न सही,
सिर्फ़ पेठा पाकर
पोती सारी खुशियाँ पा जाएगी।