सच हैं या भरम
जी रहा हूँ ज़िंदगी या कोई सपना चल रहा,
सच से होकर दूर मैं बस ख़ुद ही ख़ुद में जल रहा।
कट गया हूँ दोस्तों से, कट गया संसार से,
हार का यह दर्द गहरा हो गया हर वार से।
जब नज़र पड़ती किसी पर, आँख झुक सी जाती है,
इस ज़माने की चुभन सीने में दुख पहुँचाती है।
सोचता हूँ क्या कहेंगे लोग जो मिल जाएँगे,
नाकामियों के दाग़ मेरे क्या कभी धुल पाएँगे?
पर नहीं स्वीकार मुझको ज़िंदगी की मात ये,
रोक पाएगी नहीं अब दर्द वाली रात ये।
हाथ-पैर मारता हूँ, जीत का है फ़ैसला,
धूल में गिरकर भी मैंने खोया नहीं हौसला।
जब खुला आकाश देखूँ रात की ख़ामोशी में,
तैरता है एक सपना आँखों की मदहोशी में।
आज क़िस्मत रूठ कर भी क्या बिगाड़ेगी भला,
अँधेरे को चीर कर ही हर नया सूरज खिला।