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राख के ढेर में

Bajrang Lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            राख के ढेर में अब आग सुलगती ही नहीं,
        
                                                    
                            
चीखता है ये शहर, आवाज़ निकलती ही नहीं।
तुमने वादों के जो कागज़ थे, जला कर सेंक लिए,
ठंड से ठिठुरी हुई ये रात ढलती ही नहीं।
एक मुद्दत से खड़ी है मौन होकर भीड़ ये,
हाथ में पत्थर तो हैं, मुट्ठी मचलती ही नहीं।
मंच पर बैठे हुए सब भेड़िये हैं आज-कल,
भीड़ तालियाँ बजाती है, कुचलती ही नहीं।
रोशनी का ढोंग रचते हैं यहाँ जो रात-दिन,
उनके चेहरों की सियाही अब तो धुलती ही नहीं।
ज़िंदगी गिरवी रखी है चंद सिक्कों के लिए,
और उम्मीदों की ये गठरी सँभलती ही नहीं।
छोड़ कर बैठे हैं सब इन खोखले शब्दों का मोह,
कागज़ों पर नाव जज़्बातों की चलती ही नहीं।
एक महीने पहले
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