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दौलत से ऊँचा रेशम का धागा

Bajrang

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कागज़ के चंद टुकड़ों पर, जब रिश्ते बँटने लगते हैं,
        
                                                    
                            
ज़मीनों की इन सरहदों पर, जब अपने कटने लगते हैं।
दौलत की अंधी दौड़ में जब, दिल में दीवारें उठती हैं,
सिक्कों की खनक के आगे जब, ममता की साँसें घुटती हैं।
तब सावन की भीगी हवा, एक पावन संदेशा लाती है,
बचपन की उस मीठी किलकारी की, याद हमें दिलाती है।
जिस आँगन में संग खेले थे, वो मिट्टी अब भी वही तो है,
फिर चंद गज़ ज़मीन के पीछे, दिल में ये कैसी बेरुखी है?
बहन न माँगे महल-चौबारे, न माँगे वो कोई जागीर,
वो तो बस भाई के चेहरे पर, देखना चाहे खुशी की लकीर।
रेशम के कच्चे धागे में, सच्चा विश्वास पिरोया है,
उसने हर झगड़े-विवाद को, अपनी दुआओं से धोया है।
> खेत-खलिहान यहीं रह जाएँगे, रह जाएगी ये दौलत सारी,
> इस दुनिया के हर वैभव से, ऊँची है अपनी बहन दुलारी।
छोड़ के बैर, मिटा के दूरियाँ, आओ फिर से मुस्काएँ,
राखी के इस पावन पर्व पर, सारे गिले-शिकवे सुलझाएँ।
यह धागा नहीं महज़ रेशम का, यह प्रेम का अटूट अनुबंध है,
जहाँ स्वार्थ का कोई मोल नहीं, बस स्नेह की पावन गंध है।
'बजरंग' कहे इस रिश्ते को, मत तोलो तुम बाज़ारों में,
भाई-बहन का प्यार अमर है, लाखों और हज़ारों में।
ज़मीनें भले ही बँट जाएँ, पर मन का आँगन बँटने न पाए,
रक्षाबंधन का यह पर्व, हर दिल में फिर से प्यार जगाए।
2 घंटे पहले
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