माटी जहाँ रवींद्र की गूँजे, नज़रुल का जहाँ पैग़ाम,
साहित्य, कला और क्रांति की भूमि, सुजलां-सुफलां जिसका नाम।
पर वक़्त के लंबे साए में, कुछ थम सी गई थी रफ़्तार,
पुरानी दशा की धुंध में उलझा, सहता रहा दर्द हर बार।
संघर्षों के उस दौर में भी, आस न उसने खोई थी,
विकास की धीमी राह देखकर, माँ माटी भी रोई थी।
पर अब बदला है हवा का रुख़, छटने लगा है अंधेरा,
नई दिशा की ओर बढ़ा है, लेकर एक नया सवेरा।
नए मुख्यमंत्री के हाथों में, आई अब विकास की डोर,
उम्मीदों की नई किरण से, चमक उठा है हर एक छोर।
शिक्षा, उद्योग और प्रगति का, सजने लगा है अब ख़्वाब,
संस्कृति और आधुनिकता का, मिलने लगा है सही जवाब।
माटी का सम्मान वही है, सोच में आई नई तरंग,
समृद्धि की इस राह पर, अब सब चल निकले संग-संग।
सोनार बांग्ला फिर मुस्काए, हर घर में हो उजियारा,
नई दिशा में बढ़ता जाए, प्यारा बंगाल हमारा।