रखो दिल समंदर के जैसा,
नदी ख़ुद मिल जाएगी।
रखो नीयत में पाकीज़गी,
दुआ ख़ुद क़ुबूल हो जाएगी।
ज़रा सब्र रखो हालात पर,
हर शब सहर में ढल जाएगी,
जो क़िस्मत में लिखा है तेरे,
वो राह ख़ुद निकल जाएगी।
न रखो दिल में कोई गिला,
न शिकवा किसी से करो,
मोहब्बत बाँटते चलो यूँ ही,
मोहब्बत लौटकर आएगी।
जो ख़ामोशियों को समझ ले,
वही हमसफ़र कहलाएगा,
तुम आँखों से बात कर लेना,
नज़र ख़ुद ग़ज़ल कह जाएगी।
न गुरूर रखो दौलत का,
न शोहरत का कोई गुमाँ,
ये दुनिया फ़ानी है साहब,
हर चीज़ यहीं रह जाएगी।
रखो दिल समंदर के जैसा,
नदी ख़ुद मिल जाएगी,
तुम नेकियों के बीज बोते रहो,
बहिश्त ख़ुद मिल जाएगी।।