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सच्चाई को लफ़्ज़ों में...

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच्चाई को लफ़्ज़ों में छुपाना नहीं आता।
        
                                                    
                            
हर झूठ को सच जैसा बनाना नहीं आता।

दिल में जो है, लफ़्ज़ों में उतर आता है अक्सर,
हमको कोई मतलब नया गढ़ना नहीं आता।

हक़ बोलने का हौसला सीखा है उम्र भर,
ज़ालिम के सामने हमें झुकना नहीं आता।

नफ़रत के मकानों को गिरा देते हैं हँस कर,
हमको कभी नफ़रत को बढ़ाना नहीं आता।

हम डूब भी जाएँ तो समंदर की तरह हैं,
साहिल पे आ के शोर मचाना नहीं आता।

गैरों के इशारों पे ढलें किस लिए 'अज़हर',
हमको किसी साँचे में समाना नहीं आता।

- अज़हर साबरी
2 घंटे पहले
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