कभी वीरान दिल में भी बहारों की ख़बर आए।
वो बनकर याद मेरे दिल के आँगन में उतर आए।
कभी वो ख़्वाब बनकर यूँ मिरे दिल में समा जाए,
कभी ऐसा भी हो, वो सामने मेरे नज़र आए।
न मंज़िल की मुझे चाहत, न राहों से गिला कोई,
अगर वो हमसफ़र बनकर मेरे संग-ए-सफ़र आए।
अँधेरी रात में जब भी मिरी उम्मीद बुझ जाए,
वो बनकर चाँद मेरी ज़िंदगी में फिर नज़र आए।
न दौलत की तमन्ना है, न दुनिया की कोई चाहत,
मिरे हिस्से में बस उसका कोई लम्हा अगर आए।
न जाने कौन-सी खुशबू है उसकी याद में ऐसी,
हवा छूकर उसे गुज़रे तो मौसम भी सँवर आए।
जो बरसों से दबा रखा है मैंने राज़ सीने में,
वो उसकी इक नज़र से ख़ुद-ब-ख़ुद लब पर उभर आए।
मिरे दिल ने अभी तक हार मानी ही नहीं उससे,
कभी तो मेरी चाहत का उसे भी कुछ असर आए।
- अज़हर साबरी