हर शख़्स ने चेहरे पे तबस्सुम तो सजाया।
अंदर का मगर दर्द न दुनिया को दिखाया।
हर ज़ख़्म ने चुपचाप नया फूल खिलाया,
काँटों ने ही जीने का सलीक़ा है सिखाया।
हर दर्द ने तन्हाई का एहसास बढ़ाया,
हर अश्क़ ने ख़ामोश समंदर-सा बनाया।
रातों को यहाँ जाग के बुनते हैं जो सपने,
दिन ढलते ही वो ख़्वाब हक़ीक़त ने मिटाया।
तन्हाई ने जब-जब मुझे आवाज़ लगाई,
महफ़िल ने मुझे और भी तन्हा ही बनाया।
रिश्तों के बदलते हुए रंगों को तो देखो,
वक़्त आया तो अपनों ने भी बेगाना बनाया।
दौलत के तराज़ू में जहाँ लोग बिके हैं,
सच बोलने वालों को ही सूली पे चढ़ाया।
शीशे के मकानों में सभी रहते हैं लेकिन,
पत्थर को उठाने का हुनर सबने दिखाया।
इंसाँ ही यहाँ नफ़रतों की धूप में झुलसे,
फूलों ने मगर हर घड़ी ख़ुशबू को लुटाया।
वक़्तों की सख़ावत ने यही राज़ बताया,
गिर-गिर के ही इंसाँ ने बुलंदी को है पाया।
- अज़हर साबरी