हक़ीक़तों को कहानी में ढाल कर देखो।
ज़रा सी धूप को आँखों में पाल कर देखो।
अगर है शौक़ अंधेरों से जंग लड़ने का,
दिये की लौ को हवा में उछाल कर देखो।
जो थक गए हो अंधेरों से लड़ते-लड़ते हुए,
तो एक शम्अ सहर तक संभाल कर देखो।
नज़र में नूर का सैलाब तैर जाएगा,
शब-ए-सियाह से राहें निकाल कर देखो।
मिलेगी तुमको भी अपनी शनाख़्त की ख़ुशबू,
ख़ुदी की आग में ख़ुद को उबाल कर देखो।
सुलग रही है जो सीने में एक चिंगारी,
उसे तु लफ़्ज़ के साँचे में ढाल कर देखो।
मिलेगा अपना ही चेहरा तुझे भी ऐ 'अज़हर',
ग़ुरूर दिल से ज़रा तुम निकाल कर देखो।
- अज़हर साबरी