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हम ने देखी है बदलती सी...

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम ने देखी है बदलती सी नज़र शाम के बा'द।
        
                                                    
                            
चुप से हो जाते हैं ये सारे शजर शाम के बा'द।

तेरी यादों का धुआँ फैलता जाता है यूँ,
जैसे बुझता हो कोई शहर-ए-नज़र शाम के बा'द।

बुझ गए आँखों में जलते हुए ख़्वाबों के चराग़,
और बढ़ जाता है तन्हाई का डर शाम के बा'द।

चाँद निकला तो कई रंग नज़र आने लगे,
फिर भी सूना ही रहा दिल का नगर शाम के बा'द।

रेत पर नाम तिरा लिख के मिटाया तो लगा,
और गहरा हुआ सीने में असर शाम के बा'द।

इक दिया मेरी चौखट पे जला कर रखना,
कौन जाने कोई लौटे मेरे घर शाम के बा'द।

दूर सहरा में कोई दीप चमकता है अभी,
जैसे बाक़ी हो किसी दिल में सहर शाम के बा'द।

उम्र कटती रही, इक रात मगर कटती नहीं,
कौन लाता है सहर की भी ख़बर शाम के बा'द।

शाम ढलती है तो याद आती है तेरी 'अज़हर',
दिल में उठता है कोई दर्द मगर शाम के बा'द।
- अज़हर साबरी
एक महीने पहले
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