साये मचल रहे हैं यहाँ ढलती शाम पर।
पत्थर उछल रहे हैं शीशों के नाम पर।
हर चीज़ बिक रही है यहाँ ख़ास दाम पर,
इल्ज़ाम आ गया है वफ़ा के ही नाम पर।
चेहरे चमक रहे हैं यहाँ सिर्फ़ नाम पर,
इंसान मिट रहा है अजब इस निज़ाम पर।
पत्थर के शहर में भी वफ़ा ढूँढ़ते हैं लोग,
धोखा मिला है प्यार के हर इक पयाम पर।
ऊँचे मकान देख के रिश्ते बदल गए,
ईमान बिक रहा है नए इंतिज़ाम पर।
सीने में नफ़रतें हैं मगर लब पे है मिठास,
ज़हर पिला रहे हैं मोहब्बत के नाम पर।
ख़ामोशियाँ ही ठीक हैं इस दौर में मियाँ,
फ़तवे लगा दिए हैं यहाँ हर कलाम पर।
सूरज को रोकने की तमन्ना में रात-दिन,
परछाइयाँ ही रह गईं हिस्से में शाम पर।
दुनिया की रिवायत पे जो हैरत है आज-कल,
काँटे बिछा रहे हैं वो फूलों के नाम पर।
शीशे के इस नगर में सँभल कर चलो ज़रा,
पत्थर छुपे हुए हैं यहाँ हर सलाम पर।
अज़हर सुकून ढूँढने निकले थे हम कहाँ,
सूरज भी ढल गया है इसी ढलती शाम पर।
- अज़हर साबरी