अँधेरी सी रातों में जलता रहा।
कोई चाँद बनकर मचलता रहा।
सितारों की महफ़िल में तन्हा सा था,
वो हर इक के दिल में उतरता रहा।
भुलाना जिसे उम्र भर भी न था,
वो मंज़र निगाहों में पलता रहा।
जहाँ कोई अपना न ठहरा कभी,
तेरा नाम दिल में ठहरता रहा।
दिखाई दिया जब भी तन्हा मुझे,
मेरा अक्स मुझको वो लगता रहा।
अजब इक तमाशा है इस दौर का,
कि हर शख़्स तुझ सा ही दिखता रहा।
तेरी गर्म यादों का आलम ये था,
कि सर्दी में भी दिल सुलगता रहा।
बढ़ाती रही दूरियाँ ये हवा,
तिरा अक्स नज़दीक आता रहा।
मिरा दिल भी 'अज़हर', है तेरी तरह,
जो चुपचाप हर ज़ख़्म सहता रहा।
- अज़हर साबरी