ऋतु है कितनी खुशनुमा, बारिश है घनघोर।
टप-टप बूँदें झर रहीं, और मचातीं शोर।।
और मचातीं शोर, भीगते छप्पर-छानी।
कुँआ, नदी, तालाब, खेत में फसलें धानी।।
खड़े हुए ये वृक्ष, लगे हैं जैसे हों पितु।
लगती है अनमोल, मुझे ये वर्षा की ऋतु।।
-अविनाश ब्यौहार