हिंदी गजल
पर्व मुझे कुछ खास लगे है।
दूरी जैसे पास लगे है।।
रोना-धोना अब तो छोड़ो-
सुना लतीफे हास लगे है।
कितना भी तुम पढ़ लिख जाओ-
और छीलते घास लगे है।
उपदा को है महल अटारी-
सत्य यहांँ तो दास लगे है।
रातों में तम की सत्ता है-
दिन में मुझे उजास लगे है।
-अविनाश ब्यौहार