वो मिल बैठे आज अचानक।
भूल गया मैं काज अचानक।।
दुःख-दर्दों का ये आलम है-
गिरती है ज्यों गाज अचानक।
मन के इन सूने महलों में-
बज उठते हैं साज अचानक।
उड़ते देखा गौरैया को-
झपट पड़ा है बाज अचानक।
गड़बड़ घोटाला जो करते-
उनका खुलता राज अचानक।
-अविनाश ब्यौहार