विज्ञापन

टूटा तराज़ू

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न्याय मांगने भटका मैं,
        
                                                    
                            
कभी मंदिर और कभी मस्जिद में,
हैं इधर आध्यात्मिक अदालतें अनगिनत,
किसके कान सुने अन्याय की आवाज़ को?
इस न्याय की भीख में टूटती जा रही हिम्मत।

जैसे न्याय का तराजू लटकता है,
अंधी मूरत के कमज़ोर हाथ में,
वैसे ब्रह्मांड का इंसाफ़ अटका है,
एक अचल दिव्य मूरत के हाथ में,
पर अंधी भी और बहरी भी यह मूरत,
यह माटी क्या पहचाने इंसानी हक़ीक़त?

निर्दोषों को नहीं मिलती छाँव,
यहाँ मुजरिमों के हैं महल बसे,
यह कौन सा है दैवीय न्यायाधीश
है जिसका ईश्वरीय तराजू त्रुटिपूर्ण?
मूक खड़ी इस मूरत के आगे,
हर इंसाफ़ की आस रह गई अपूर्ण!

अगर है सब छलावा इंसाफ़ इधर,
तो क्यों झोंका मुझे न्यायिकता की भट्टी में?
अगर पुण्य की टूटी नौका है इधर,
और पाप ही एकमात्र सहारा है,
तो क्यों फेंका मुझे नैतिकता के सागर में?
जब डूबना ही था अंत में बेबस होकर,
तो क्यों भटकाया मुझे इस झूठे आदर में?
अगर मौन रहकर तमाशा ही देखना था तुझे,
तो क्यों खींच लाया मुझे इस धर्म के गागर में?
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

श्री सनातन

671 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13377 कविताएं

View Profile

Neet Biology

43 कविताएं

View Profile