विज्ञापन

सलाखों के पीछे

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जल रही तेरी बेटी, इंसानो के हाथ,
        
                                                    
                            
पृथ्वी की दुर्दशा में है, तेरा भी साथ,
बच्चे भूखे मर रहे, तड़पे कई परिवार,
जुर्म बढ़ रहे, और पेड़ सारे कट रहे,
अपनी ही रचना की कौन न सुनता पुकार?

कारणों की खोज में, मैंने अर्श की दहलीज़ लांघी,
भौचक्का रह गया, जब पाया सलाखों से भगवान,
हर अत्याचार के पीछे, मैंने उससे वजह मांगी,
सवाल के शोर ने भी उसकी खामोशी नहीं मिटाई,
नज़रें उठाकर देखा उसने, सिले होंठ पड़े दिखाई।

बेचारे भगवान से मैंने नर्म वाणी में पूछा,
आपको सलाखों में डालने की किसकी जुर्रत?
नम आँखों में जवाब लिए देखा मेरी ओर,
इंसानों के निर्माता की जानी ईश्वरीय हकीकत,
इस अपराध के पीछे है सिर्फ इंसानी हिम्मत।

इंसानियत की तरफ से सोचा करने को पश्चाताप,
लगा हिलाने सलाखों को जान के सबका पाप,
खुदाई कारागार में थक, मैंने भरी इंसानी सांसें,
हृदय पिघला मेरा देख कर, रब की रुलाई,
अचानक छू कर उसने मुझे सच्चाई दिखाई।

स्पर्श के क्षण में, वहम की समझी परछाई,
देखते ही देखते, खुदा मिटकर बना हवाई,
इंसानों ने मिलकर बुनी थी यह झूठी खुदाई,
न कोई ईश्वर, न कोई सलाखें, यही थी सच्चाई,
इंसानी सतही दिल में भरी थी ईश्वरीय गहराई।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pradeep Kairana

2 कविताएं

View Profile

Kunwar Sarvendra

167 कविताएं

View Profile