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मालिक हज़ार

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जन्म लिया और तमाशा प्रारंभ,
        
                                                    
                            
मंच सजा और हुए खड़े स्तंभ,
कठपुतली नाचने को अब तैयार,
मजबूरी उसकी और मालिक हज़ार,
अदृश्य डोर से है जुड़ा, नहीं है निस्तार।

ताली बजी और हुआ खेल शुरू,
कठपुतली चाहे जाना दाएँ,
पर डोर खींचे उसको बाएँ,
उसकी इच्छा को आज्ञा ने मारा,
रक्त के बंधन से बंधा बेचारा,
जान उसकी, पर नहीं अधिकार सारा,
चाल उसकी, पर परिवार का इशारा।

तालियों की ताल में तानों का तांडव,
मिली डोर मुल्क को, मौके से मालिक,
कायनात के कायदे में कठपुतली कैद,
दुनिया के दबाव से घुटता दम,
हँसता-हारता हृदय हताश
विकल वजूद का विवश विनाश।

समाज की संतुष्टि का था यह त्योहार,
नाच-नाच के बेबस खिलौना बीमार,
ज़माने का ज़ुल्म और डोरों का अत्याचार,
टूटी बेजान कठपुतली और सब मालिक फ़रार।
2 महीने पहले
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