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ख़्वाहिशों की ज़ंजीर

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज़ादी के वहम में कैदी यह ख़ुशनुमा,
        
                                                    
                            
सोने की ज़ंजीरों को समझ आभूषण,
बंधनों को सजाता, करता उनका रूमीकरण,
मगर है यह ग़ुलाम भीतरी इच्छाओं का,
कुछ वासनाओं ने किया स्वतंत्रता का हरण।

ऊँचाइयाँ छू कर भी तवज्जो का मुंतज़िर,
मक़बूल होने पर भी तस्दीक़ का फ़क़ीर,
वजूद का सुबूत हैं कुछ हज़ार आँखें,
भरे बग़ीचे में सबकी पहचान महकती,
मगर अधिक महकना चाहता है हर फूल।

जो दिल कभी अपनी ही सल्तनत का था सुल्तान
वो आज हसीन क़ैदख़ाने का है अज़ीज़ मेहमान,
इश्क़ बना था मसीहा आज़ादी के नूर का,
मगर बनाया तड़प ने ग़ुलामों का एक सुल्तान,
रूहानी मोहब्बत क्या जाने यह बे-रूह इंसान।

यह अनगिनत इच्छाएँ हैं बस अनंत ग़ुलामी,
आज़ादी के अज़ीम समंदर के मुक़ाबले,
यह छोटी झील का है सुनहरा-वहमी पानी,
मेरे अस्तित्व की काया, इस झील से बहुत विशाल,
ख़्वाहिशों के क़िस्सों से बड़ी, है आज़ादी की कहानी।
2 महीने पहले
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