हुई शुरू वो रात ध्यानमग्न,
जब आ थकी छोटी सुई एक पर,
तब सोई है दुनिया मस्तमग्न,
मेरे ख्याल जागो रहे मगर।
जैसे सुई न सोती, चलती रहती,
टिक - टिक करती सुई बड़ी,
वैसे मेरा मन भी न रूकता,
चलता रहता हर खड़ी।
सीत दीवारें, बंद खिड़कियाँ,
सिगरेट का धुआँ, मेरे साथी हैं,
यह गंभीर रात के सागर में,
मे अकेला तैर रहा, और न कोई बाकी है।
सब लौट गए अपने घर,
सुई के थकने से पहले,
पर मैं अपने ख्यालों की नौका पे,
बह आया हूँ यादों के टापू पे।
अब आ रूकी छोटी सुई दो पर,
मगर नींद की कोई दस्तक नहीं,
वो मोटी किताबें मुझे पुकारती है
और पन्नों में पुरानी तस्वीरे भी,
गीत गातीं इन बहरे कानो में,
पर मैं करवट लेता, छत को चुनता,
अब मटकता पंखा भी घूरता।
यह कुछ आँखें और कुछ आवाज़े,
नींद तो मुझसे छीन चुकी हैं,
अब होश भी मेरा चुराती हैं।
अब छोटी सुई आई बहके तीन पर,
सच और भूतो के भारी समय में,
मैं इंसान क्यों जाग रहा?
तन्हाई ने मुझपे कमान खींची है,
या मैं खुद यादों से भाग रहा।
सच्चाई के भूतिया आलम में,
मेरे झूठ के महल रोशन लगते हैं,
पर गंभीर रात की यही निशानी,
वही सुबह बिखरे खंडहर दिखते हैं।
अंत में आई सुई चार पर,
जागा सन्नाटा भी सो पड़ा,
कुछ का सुरज पहले जलता,
और मेरा अब जाके ढलता।
थके मन के साथ
आँखे भी मेरी बंद पड़ीं
धीरे-धीरे जब रात उठी,
तब जाके हुई मेरी बंद घड़ी।