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डिजिटल कुएँ का मेंढक

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक तालाब की यह सारी मछलियाँ,
        
                                                    
                            
फिर भी सब एक दूसरे से अनजान,
ट्रेन की बोगियों में भरे हैं सब,
जैसे भेड़ों की मुस्तकिल पहचान,
भीड़ में कंधे घिसते आपस में,
फिर भी मन इनका है वीरान।

बोल इनके गायब हैं, जैसे गूँगे भूत सवार,
अपने ही कुएँ में अटके, न दूजा मेंढक चाहे,
चमकती है चेहरों पर बस यह नीली रोशनी,
झुकी हुई गर्दन, स्क्रीन पर टिकी निगाहें,
पास बैठे शख्स से कोई वास्ता नहीं,
मगर दूर के अजनबियों से खुली हैं बाहें।

एक मशीन है हाथ में, दूजी बन गई सीने में कहीं,
इंसान भी अब पुर्जा हुआ, वो पुरानी बात रही नहीं।
धड़कता हुआ दिल अब तो बस एक हार्डवेयर है,
और ये बेताब भावनाएँ, जैसे कोई सॉफ़्टवेयर है।
वाई-फाई सिग्नल पाँच खूँटी होना यहाँ अब आम है,
मगर अफ़सोस, दिलों के आपसी सिग्नल यहाँ जाम हैं।

नज़रें उठी ऊपर जब बैटरी हुई लाल,
तब काली स्क्रीन पे दिखा चेहरा अजनबी,
तकनीक हुई बंद और तन्हाई आयी समझ,
सॉफ़्टवेयर हैंग हुआ, धड़की मशीन तभी,
अचानक मानव ने समझा अपना मशीनी अतीत,
स्क्रीन का कुआं छोड़ के, मेंढक बना इंसान अभी।
3 महीने पहले
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