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दाग़-ए-मोहब्बत

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मोहब्बत की स्याही बही,
        
                                                    
                            
और ज़िद्दी दाग़ छपा दिल पर,
रूह भी मेरी हुई रंगीन,
अब फूल महके हैं हज़ार,
पहले बंजर थी मेरी ज़मीन।

दुनिया जहान ने उँगली उठाई,
बुद्धि रूपी साबुन से रगड़ा मेरा हृदय,
पर नहीं फीकी पड़ी स्याही की गहराई,
अब यह अंधे अनजान क्या रंग जानें,
रूह के सिंदूर को मैला दाग़ पहचानें।

इस बेरंग ज़िंदगी के आसमान में,
रंग भरा इस दाग़ ने जैसे कोई सितारा,
इस बंजर दिल के सूखे रेगिस्तान में,
मोहब्बत महकी जैसे उगा कोई गुलाब प्यारा।

लोगों ने गाया दाग़-ए-मोहब्बत गीत,
पर समझेंगे, जब देखेंगे मेरी प्रीत,
मोहब्बत से न होता मैला दिल,
इस दाग़ ने करा रूह को रोशन-ए-इलाही,
वह जो एक कलम उसने छोड़ी मेरी जेब में,
रक्त-समान धड़काती है दिल को वह स्याही।
2 महीने पहले
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