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चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई

Atul Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिखा ज़रथुस्त्र को विशाल पर्वत,
        
                                                    
                            
पहाड़ की परछाईं से हुआ प्रभावित,
हिसाब लगाकर स्वर्ण शिखर की ऊंचाई,
सांस बांध करी शुरू चढ़ाई,
बाकी पर्वतारोहियों ने कपट-नीति दिखाई,
सहायता मांगने का करा ढोंग,
मगर एकनिष्ठ ज़रथुस्त्र को न दिया सुनाई,
उसके मन में बस एक आवाज़ गूंजी,
चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई।

पहुँचके सोने के शिखर पर,
उसको समझी पर्वत की मायावी सच्चाई,
भ्रम की नींव और भौतिकवादी चोटी,
बाकियों की थी यह ऐशो-आराम की चटाई,
मगर इस राही को थी, कुछ और की तलाश,
अचानक दिखा एक और पहाड़ी ऊंचाई,
गिरते झरने की धुन से आकर्षित होकर बोला,
चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई।

चूमने को चला और ऊंची चोटी को,
इस पर्वत पे कम भीड़ और अधिक कठिनाई,
कुछ ने प्रतिस्पर्धा में तरकीब लगाई,
ज़रथुस्त्र को गलत ज्ञान की राह दिखाई,
मगर चढ़ता रहा झरने के स्रोत की ओर,
मिला एक प्रज्ञा का सरोवर, और थी गहराई,
दिखे बहुत महात्मा करते ज्ञान में स्नान,
यह जिज्ञासु ने देखी एक और धुंधली ऊंचाई,
बिना करे विश्राम और संदेह, बोला-
चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई।

यह थी सबसे कठिन चढ़ाई,
शांत रहे पर थी बस तन्हाई,
मुश्किलें सब आकर लगाती गले,
ऊपर होती गयी चट्टानें बर्फ़ाई,
अब सांसें भी गूंजती और मचाती शोर,
कहतीं-ज़रथुस्त्र तेरे बस की न चढ़ाई,
मगर बुद्ध का बोध रख आगे बढ़ा,
आख़िर में बर्फ़ीली चोटी की करी गवाही,
सुनसान शिखर पर दिखी एक प्रतिमा,
उस पर जमी सारी ज़िद्दी बर्फ़ हटाई,
दिखा आत्मचिंतन का गहरा दर्पण,
ज़रथुस्त्र को दिखी खुद की परछाईं,
छवि ने बोला कुछ शब्दों में-
चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई।
चल ज़रथुस्त्र कर पर्वत की चढ़ाई।
2 महीने पहले
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