जिस राह पर चले, वह इंसाफ़ की इबादत बन गई,
इंसाफ़ की मसनद पर विराजमान हुए तो अदालत की गरिमा और बढ़ गई।
न दबाव के आगे झुके, न प्रश्नों से कभी डिगे,
हर फ़ैसले में संविधान की आत्मा और न्याय की मर्यादा दिखी।
निष्ठा और सत्य के अटल संकल्प से, आपका हर निर्णय न्याय की अमिट मिसाल बनी।।
यह काव्य, लेखक ने माननीय न्यायमूर्ति विक्रम नाथ जी को समर्पित की है, जो वर्तमान मैं सर्वोच्चय न्यायालय के न्यायाधीश है।