मैं अब खुद से ओझल होता जा रहा हूँ।
आईने में चेहरा तो वही दिखता है,
पर उसमें पहले वाला "मैं" कहीं नज़र नहीं आता।
जो मुस्कान कभी बिना वजह आ जाती थी,
अब वजह होने पर भी नहीं आती।
लोग कहते हैं,
समय सब ठीक कर देता है।
पर कुछ खालीपन ऐसे होते हैं,
जो समय के साथ बस जीना सिखाते हैं,
भरते कभी नहीं।
मैं चल तो रहा हूँ,
ज़िम्मेदारियाँ भी निभा रहा हूँ,
लेकिन भीतर कहीं
धीरे-धीरे खुद से ही दूर होता जा रहा हूँ।
ऑफिस में कभी किसी शीशे से टकरा जाता हूँ,
तो कभी किसी के नमस्कार का जवाब देना भूल जाता हूँ। लोग शायद इसे मेरी लापरवाही समझते होंगे,
पर सच तो यह है कि मेरा मन अब कहीं और ही ठहरा रहता है।
शायद...
मैं लोगों के बीच मौजूद हूँ, पर अपने ही भीतर
धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा हूँ।
-आशुतोष श्रीवास्तव