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समझ का फेर

Ashutosh Amit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये तेरी कमी थी
        
                                                    
                            
तुम जिस प्यादे को वजीर समझ बैठे
तुम जिस कायर को वीर समझ बैठे
वो था बस एक तिनका तिनका
तुम उसको तीर समझ बैठे
थी पानी पर रेख न थी पत्थर की लेख
था वो बस एक रस्सी तुम उसे जंजीर समझ बैठे
ये थी तेरे समझ की फेर
साँझ को सवेर समझ बैठे
करते रहते जिससे हास
जिससे जीवन में था उल्लास
जिसको समझे रस विलास
वह था बस एक स्वप्न मात्र
तुम उसको जीवन का
श्वास समझ बैठे
जिससे तुमने सपने पाले
थोड़े उजले - थोड़े काले
हाय! व्यर्थ वह जीवन मात्र
तुम उसे विश्वास समझ बैठे।
10 घंटे पहले
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