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समझ का फेर

                
                                                         
                            ये तेरी कमी थी
                                                                 
                            
तुम जिस प्यादे को वजीर समझ बैठे
तुम जिस कायर को वीर समझ बैठे
वो था बस एक तिनका तिनका
तुम उसको तीर समझ बैठे
थी पानी पर रेख न थी पत्थर की लेख
था वो बस एक रस्सी तुम उसे जंजीर समझ बैठे
ये थी तेरे समझ की फेर
साँझ को सवेर समझ बैठे
करते रहते जिससे हास
जिससे जीवन में था उल्लास
जिसको समझे रस विलास
वह था बस एक स्वप्न मात्र
तुम उसको जीवन का
श्वास समझ बैठे
जिससे तुमने सपने पाले
थोड़े उजले - थोड़े काले
हाय! व्यर्थ वह जीवन मात्र
तुम उसे विश्वास समझ बैठे।
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9 घंटे पहले

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